वापस हो सकता है? तो जल्दी करो
सोचते रहने का जाल
राजू चाय की दुकान पर बैठा है।
एक Rapido driver से बात हो रही है। वो बता रहा है—"भाई, मेरे एरिया में Rapido चल रहा है। Ola से बेहतर कमाई।"
राजू सोचता है। वो भी Rapido try करना चाहता है।
पर एक डर है:
"अगर काम नहीं आया तो?"
"Ola छोड़ा और Rapido flop hua toh?"
"पता नहीं, risk है..."
तीन महीने हो गए सोचते हुए।
Ola चलाते रहो—पक्का है, पता है कितना मिलेगा।
Rapido try करो—शायद बेहतर हो, शायद नहीं।
राजू decision लेना चाहता है।
पर इतना सोच रहा है जैसे यह ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला हो।
जबकि—अगर Rapido नहीं चला, तो Ola वापस कर सकता है। कोई नहीं रोकेगा।
सीधी बात
हर फैसले को एक जैसी सोच की ज़रूरत नहीं होती।
दो तरह के फैसले होते हैं:
बड़े फैसले (Type 1): जो वापस नहीं हो सकते, बड़ा असर डालते हैं।
एक बार किया तो वापस मुश्किल।
जैसे: शादी करना, बड़ा loan लेना, दूसरे शहर shift होना।
छोटे फैसले (Type 2): जो वापस हो सकते हैं, try करके देखो।
अगर नहीं चला, तो पहले वाली जगह वापस आ सकते हो।
जैसे: नया app try करना, अलग route पे काम करना, कुछ हफ्ते कुछ नया आज़माना।
ज़िंदगी के ज़्यादातर फैसले छोटे (Type 2) हैं।
पर लोग छोटे फैसलों को भी बड़ा बना देते हैं—और फंस जाते हैं उन decisions पे जो simply try करके देखी जा सकती थीं।
गलत होना ठीक है।
इसमें कोई शर्म नहीं।
इसका मतलब बस यह है कि try किया और नहीं चला।
बड़े और छोटे फैसले
सोचते रहने की कीमत
हर फैसले में कुछ दिमागी ताकत लगती है। सवाल यह है: actually कितनी ज़रूरत है?
जब 3 महीने सोचो किसी चीज़ पे जो 1 हफ्ते में test हो सकती है, तो सोचने की कीमत दे रहे हो:
- वक़्त गया wait करने में
- दिमाग analysis में थका
- Real-world feedback से सीखने का मौका गया
हम छोटे फैसलों को बड़ा क्यों बना देते हैं
हम ज़्यादातर फैसलों को actual से बड़ा मान लेते हैं क्योंकि:
- गलत होने का डर — गलतियों से बचना सिखाया गया
- वक़्त "waste" होने का डर — अगर fail हुआ तो?
- लोगों की सोच — fail हुआ तो क्या कहेंगे
पर ज़्यादातर फैसलों की reality:
- Fail हुआ तो सीखो और आगे बढ़ो
- Succeed हुआ तो उस पर build करो
- दोनों cases में, रुके रहने से बेहतर हो
असली रिस्क
सबसे बड़ा risk अक्सर गलत छोटा फैसला लेना नहीं है।
छोटे फैसलों पर इतना सोचते रहना कि बड़े फैसलों तक पहुंचो ही नहीं—जो actually matter करते हैं।
फैसले की मेहनत को actual risk और वापसी की possibility से match करो।
राजू की कहानी
तीन महीने की सोच। कोई action नहीं।
राजू ने आख़िर खुद से पूछा: "Worst case क्या है?"
Worst case: एक हफ्ता Rapido try किया। कम पैसा मिला। वापस Ola कर लिया।
बस। कोई loan नहीं डूबा। कोई बड़ा नुकसान नहीं। बस एक हफ्ते की थोड़ी कम कमाई—और पता चल गया कि क्या better है।
The Shift
उसने filter लगाया:
- वापस हो सकता है? हां—Ola कभी भी कर सकता है
- Worst-case cost? 1-2 हफ्ते की थोड़ी कम कमाई
- छोटा test हो सकता है? हां—एक हफ्ता Rapido try करो, numbers देखो
Verdict: छोटा फैसला है। सोचना बंद करो। Try करो।
एक हफ्ते बाद
Rapido try किया। Numbers देखे।
Result: उसके एरिया में actually Ola better था। Rapido वालों की बातें उनके एरिया के लिए थीं।
अब
राजू ने Ola continue किया। पर अब उसे पता है—guess नहीं, real experience से।
वो तीन महीने जो सोचने में गुज़ारे—वो एक हफ्ते में पता चल सकता था।
Try करने से नुकसान नहीं हुआ। सोचते रहने से वक़्त गया।
बड़ा या छोटा? फ़िल्टर
यह 3-सवाल का filter use करो—पता करो फैसला कितना बड़ा है और कितना वक़्त देना चाहिए।
बड़ा या छोटा? फ़िल्टर
सवाल 1: वापस हो सकता है?
- क्या यह फैसला undo हो सकता है या easily बदल सकता है?
- Mind change करना महंगा, मुश्किल, या public होगा?
आसानी से वापस हो सके → छोटा (Type 2)
वापस करना मुश्किल/महंगा → बड़ा (Type 1)
सवाल 2: गलत होने की worst-case कीमत क्या है?
Real नुकसान सोचो—imagined शर्मिंदगी नहीं।
- पैसे का नुकसान?
- वक़्त waste?
- इज़्ज़त को धक्का?
कीमत manageable और recoverable → छोटा (Type 2)
कीमत ज़्यादा और recovery मुश्किल → बड़ा (Type 1)
सवाल 3: छोटा test पहले हो सकता है?
छोटे फैसले अक्सर साफ हो जाते हैं जब छोटे scale पे test करो।
- 1 साल की जगह 1 हफ्ता try कर सकता हूं?
- ₹50,000 की जगह ₹5,000 लगा सकता हूं?
- पूरी तरह commit करने से पहले पता कर सकता हूं?
अगर हां → शायद ज़्यादा सोच रहे हो। करो।
आख़िरी कदम: मेहनत को type से match करो।
- बड़ा (Type 1) → रुको, जानकारी लो, पूछो, सोच-समझ कर decide करो।
- छोटा (Type 2) → जल्दी decide करो, test करो, बदलो।
आखिरी बात
सोच लिया। पूछ लिया। हिसाब लगा लिया।
और still "information gather" कर रहे हो एक फैसले पर जो simply try करके देखी जा सकती है।
एक बात समझो: अगर फैसला undo हो सकता है, तो महीनों की सोच deserve नहीं करती।
जल्दी test करो और adjust करने की तैयारी रखो।
Goal लापरवाह होना नहीं।
Goal फैसले की मेहनत को actual risk और वापसी की possibility से match करना है।
छोटे फैसले पर गलत होना failure नहीं।
वो सीख है।
जो फैसले तुम्हें रोक रही हैं अभी—ज़्यादातर छोटी (Type 2) हैं।
Try कर सकते हो। देखो क्या होता है। बदल लो।
यह risky नहीं है। सीखना ऐसे ही होता है।
करने की तैयारी बंद करो।
करो।
फिर बदलो।
याद रखो
समझने की बात:
हर फैसले को बराबर सोच की ज़रूरत नहीं। छोटे (Type 2) फैसले जल्दी लो और test करो; बड़े (Type 1) फैसलों पे सोच-समझ कर काम करो।
टूल:
बड़ा या छोटा? फ़िल्टर—पूछो: वापस हो सकता है? Worst-case कीमत क्या है? छोटा test पहले हो सकता है? मेहनत को type से match करो।
कब इस्तेमाल करो:
जब सोच-सोच के फंस जाओ। जब testable फैसले को life-death की तरह treat कर रहे हो। जब बस try करने की permission चाहिए।
याद रखो:
छोटे फैसले पर गलत होना बस सीख है। जो फैसले बड़ी feel होती हैं, वो actually वापस हो सकती हैं ज़्यादातर।