हर हां एक ना भी है
छिपी कीमत
रात के 10 बज गए।
राजू का फोन बजता है। एक और ride request।
Body थकी हुई है। पीठ दर्द कर रही है। बीवी का missed call है—तीसरा आज।
पर सोचता है: "₹150 और मिल जाएंगे। लेता हूं।"
Ride accept करता है।
14 घंटे हो गए आज। ज़्यादा पैसा कमाना है—बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्चा, थोड़ी बचत।
पर एक हिसाब है जो वो नहीं लगा रहा।
उन extra 4 घंटों में क्या खो रहा है?
- बीवी के साथ वक़्त
- बच्चों को देखना
- अपनी सेहत
- आराम
₹800 ज़्यादा कमा लिए। पर क्या गया?
वो "गया" वाला हिस्सा दिखता नहीं—जब तक बहुत देर न हो जाए।
सीधी बात
एक बात समझो:
हर "हां" एक "ना" भी है।
किसी एक चीज़ को हां बोलो, तो automatically किसी और चीज़ को ना बोल रहे हो—चाहे समझो या न समझो।
इसे opportunity cost कहते हैं।
यह उन सबके लिए है जिन्होंने कभी:
- एक काम को हां बोला और थक गए
- किसी draining commitment में ज़्यादा वक़्त दिया
- "बस एक और" agree किया और आराम miss कर दिया
जब hidden cost नहीं गिनते, तो भुगतना पड़ता है—ऐसे तरीके से जो पैसों में नहीं दिखता।
वक़्त। ताकत। ध्यान। सेहत। रिश्ते।
यह भी currencies हैं। और यह limited हैं।
वो कीमत जो दिखती नहीं
जो दिखता है vs. जो नहीं दिखता
जब एक और ride मिलती है, दिखने वाली कीमत दिखती है: एक घंटा, petrol, थोड़ी थकान।
पर छिपी कीमत भी है:
- शरीर की थकान: 14 घंटे गाड़ी चलाने से body टूटती है
- मन का बोझ: हमेशा "एक और" सोचना
- घर का वक़्त: बच्चों को सोते देखना, बीवी से बात न करना
- सेहत: पीठ दर्द, नींद कम, tension
वो "₹150 की ride" actually cost करती है:
- 1 घंटा driving
- Body pain जो रात को तंग करेगी
- बीवी से एक और missed call
- बच्चों का एक और दिन बिना पापा के
वो ₹150 नहीं है। वो बहुत कुछ है।
ज़्यादा काम = ज़्यादा कमाई... या नहीं?
सोचते हो "ज़्यादा काम करूंगा, ज़्यादा पैसा आएगा।"
पर अगर बीमार पड़ गए?
Ek हफ्ते का काम गया।
अगर body break down हुई?
Doctor का खर्चा, दवाई, rest—सब मिलाकर कितना गया?
Short-term ज़्यादा कमाई, long-term नुकसान।
सेहत, परिवार, और आराम को जो "ना" दे रहे हो—वो तब दिखती है जब emergency बन जाती है।
राजू की कहानी
राजू को एक दिन पीठ में बहुत तेज़ दर्द हुआ।
Doctor ने बोला: "भाई, rest करो। 10 दिन गाड़ी मत चलाओ।"
10 दिन = ₹15,000+ का नुकसान। Plus doctor का खर्चा ₹3,000।
कुल नुकसान: ₹18,000+
राजू ने सोचा—पिछले 3 महीने में उन extra 4 घंटों से कितना कमाया?
Average ₹800/day × 90 days = ₹72,000
पर उन्हीं घंटों की वजह से:
- Body damage हुई
- बीवी से झगड़े बढ़े
- बच्चों को वक़्त नहीं दिया
- और अब 10 दिन की छुट्टी
The Shift
राजू ने decide किया: 10 घंटे रोज़, maximum।
पहले महीने कमाई थोड़ी कम हुई।
पर:
- पीठ दर्द कम हुआ
- बीवी से रिश्ता better हुआ
- बच्चों के साथ वक़्त मिला
- Sunday off रखना शुरू किया
6 महीने बाद
Actually ज़्यादा healthy feel करता है। कम बीमार पड़ता है। झगड़े कम हुए।
और long-term देखो—अगर body healthy रहेगी, तो 10 साल और काम कर पाएगा।
वो "कम" कमाई actually ज़्यादा है—जब पूरा हिसाब लगाओ।
असली कीमत देखो
किसी भी "हां" बोलने से पहले असली कीमत देखो।
असली कीमत देखो
पहला कदम: इसकी कीमत क्या है...
- वक़्त? (शुरू से आख़िर तक)
- ताकत? (बाद में थके रहोगे?)
- शरीर? (दर्द, थकान, नींद कम?)
- घर? (परिवार को वक़्त नहीं मिलेगा?)
एक छोटा काम भी छिपी तैयारी, बदलाव का वक़्त, या emotional drain ला सकता है।
दूसरा कदम: बदले में क्या मिलेगा—और worth it है?
पूछो: "इसके बदले क्या मिल रहा है—और जो दे रहा हूं उसके बराबर है?"
₹800 extra कमाने के लिए body तोड़ना और बीवी से लड़ना?
शायद worth it है। शायद नहीं। पर अब जान-बूझ कर choose कर रहे हो।
तीसरा कदम: यह फ़ैसला और क्या affect करेगा?
यहां clarity मिलती है।
- क्या यह मेरा ज़रूरी काम delay करेगा?
- क्या यह मेरा mood या energy affect करेगा?
- किसको implicitly "ना" बोल रहा हूं?
बड़े हिसाब की ज़रूरत नहीं।
बस 30 second की ईमानदार सोच before saying yes।
Goal हर चीज़ को ना बोलना नहीं।
Goal यह है कि तुम्हारी "हां" जान-बूझ कर हो।
आखिरी बात
Numbers में तो जीत रहे हो।
ज़्यादा rides। ज़्यादा घंटे। ज़्यादा पैसा।
पर एक हिसाब है जो तुम नहीं देख रहे—वो जो track करता है क्या खो रहे हो।
तुम्हारी ताकत unlimited नहीं है।
तुम्हारा वक़्त elastic नहीं है।
तुम्हारी सेहत और रिश्ते हमेशा wait नहीं कर सकते।
हर "हां" जो एक चीज़ को दे रहे हो, वो "ना" है किसी और को।
और वो "ना" चुपचाप बढ़ती है—जब तक emergency न बन जाए।
सवाल यह नहीं कि "यह पैसा अच्छा है?"
सवाल यह है: "इस पैसे के लिए क्या trade कर रहा हूं—और वो trade सही है?"
कीमत गिनना शुरू करो।
पूरी कीमत।
ऐसे ही टिकाऊ कामयाबी बनती है।
याद रखो
समझने की बात:
हर हां एक ना भी है। वक़्त, ताकत, ध्यान, और रिश्ते currencies हैं—और हर फ़ैसला उन्हें खर्च करता है।
टूल:
असली कीमत देखो—commit करने से पहले check करो: वक़्त/ताकत/सेहत में क्या cost है? बदले में क्या मिलेगा? किसको implicitly "ना" बोल रहा हूं?
कब इस्तेमाल करो:
किसी भी बड़े commitment से पहले। जब overcommitted लगे पर समझ न आए क्यों। जब "छोटी" request भारी लगे।
याद रखो:
वो कीमत जो पैसों में नहीं दिखती, वो भी कीमत है। उसे गिनो।