जो गया सो गया — डूबते को और मत डुबाओ
फंसाव
शाम के 4 बज गए।
राजू अपनी दुकान में बैठा है। मोबाइल रिपेयर की दुकान। आज के कस्टमर? दो।
एक साल हो गया दुकान खोले। दो लाख लगाए थे—कुछ अपनी जमापूंजी, कुछ लोन।
सोचा था धंधा चल पड़ेगा। पर चला नहीं। लोकेशन ठीक नहीं है। बड़ी दुकानें पास में हैं। कस्टमर आते नहीं।
महीने का किराया निकलना मुश्किल है।
पर जब भी दुकान बंद करने का सोचता है, एक आवाज़ रोक लेती है:
"दो लाख लगाए हैं। अब बंद किया तो सब डूब जाएगा। थोड़ा और देख लो।"
यही सोच के 6 महीने और निकल गए।
और यही सोच लाखों लोगों को फंसाए रखती है—धंधे में, नौकरी में, फैसलों में।
सीधी बात
सीधी बात समझो:
जो पैसा लगाया, वो गया। जो आगे करना है, वो अभी भी तुम्हारे हाथ में है।
इसे Sunk Cost कहते हैं—एक ऐसी सोच जो समझदार लोगों को भी फंसा देती है।
हम ऐसी चीज़ों में पैसा और वक़्त डालते रहते हैं जो अब काम नहीं कर रहीं—सिर्फ इसलिए कि "पहले इतना लगा चुके हैं।"
पर सोचो—
वो दो लाख वापस नहीं आएंगे। चाहे दुकान चालू रखो या बंद करो।
वो पैसा गया।
अब सवाल यह है: जो बचा है—अपना वक़्त, अपनी मेहनत, बाकी पैसा—उसका क्या करना है?
जो गया उसके पीछे और डुबाना—यही असली नुकसान है।
यह जाल कैसे काम करता है
यह जाल ऐसे काम करता है:
तुम किसी चीज़ में पैसा या वक़्त लगाते हो।
कुछ समय बाद लगता है कि यह काम नहीं कर रहा।
छोड़ने का मन करता है।
पर एक आवाज़ कहती है:
"इतना तो लगा चुके।"
"अब छोड़ा तो सब बेकार।"
"थोड़ा और देख लो।"
तो तुम रुक जाते हो। और लगाते रहते हो।
इसलिए नहीं कि काम हो रहा है—बल्कि इसलिए कि मानना नहीं है कि नहीं हो रहा।
यही Sunk Cost है।
यही वजह है कि लोग:
- ऐसी नौकरी में रुके रहते हैं जो खुशी नहीं देती
- ऐसे धंधे में पैसा डालते रहते हैं जो चल नहीं रहा
- ऐसे रिश्ते में रहते हैं जो ख़त्म हो चुका है
- ऐसी पढ़ाई पूरी करते हैं जो दिल से नहीं है
पुराने को बचाने में लगे रहते हैं—आगे का सोचते ही नहीं।
और सबसे बुरी बात? रुकने से पुराना वापस नहीं आता। सिर्फ नुकसान और बढ़ता है।
राजू की कहानी
राजू दो साल Ola चलाता था। ठीक-ठाक कमाई थी। पर सोचा—"अपना कुछ करना चाहिए।"
एक दोस्त ने बताया—"मोबाइल रिपेयर की दुकान खोल। बढ़िया चलती है।"
राजू ने सोचा। कुछ पैसे थे। कुछ लोन लिया। दो लाख में दुकान खोल दी।
पहले तीन महीने ठीक गए। फिर धीरे-धीरे कस्टमर कम होने लगे। पास में बड़ी दुकान खुल गई थी। लोकेशन भी सही नहीं था।
एक साल बाद हालत:
- किराया मुश्किल से निकलता है
- कभी-कभी खुद की जेब से देना पड़ता है
- EMI का बोझ अलग
घर वालों ने पहले ही कहा था—"मत कर, रिस्क है।" अब सब चुप हैं।
पर राजू बंद नहीं कर पा रहा:
"दो लाख लगाए। अब बंद किया तो सब डूबा। थोड़ा और देख लेता हूं।"
असली सवाल
एक दिन चाय की दुकान पर बैठा था। किसी ने बोला—"भाई, तू सोच। अगर आज तेरे पास यह दुकान नहीं होती, तो क्या तू यह खोलता?"
राजू ने सोचा। ईमानदारी से।
जवाब आया: नहीं।
लोकेशन ख़राब है। मार्केट में competition है। पैसा डूब रहा है।
तब समझ आया—वो दो लाख तो गए। अब रुकने से वो वापस नहीं आएंगे। पर जितना और लगाएगा—वो भी जाएगा।
राजू ने दुकान बंद की।
दो महीने तकलीफ़ में गुज़रे। लोगों ने बातें बनाईं।
पर फिर उसने एक AC रिपेयर का कोर्स किया। छोटा कोर्स, कम पैसे में।
अब वो घर-घर जाकर AC और फ्रिज ठीक करता है। कोई दुकान का किराया नहीं। अपना टाइम। बढ़िया कमाई।
जो पुराना था उसे छोड़ा—तब नया रास्ता मिला।
'आज होता तो यही करता क्या?' टेस्ट
यह एक आसान तरीका है सोचने का। जब भी किसी चीज़ में फंसा लगे—इसे आज़माओ।
"आज होता तो यही करता क्या?" टेस्ट
पहला कदम: पहचानो
वो चीज़ सोचो जिसमें फंसे हो—धंधा, नौकरी, रिश्ता, कोई फैसला।
दूसरा कदम: ईमानदारी से पूछो
"अगर आज मेरे पास यह नहीं होता—न पैसा लगा होता, न वक़्त दिया होता—तो क्या मैं आज यही करता?"
यह मत पूछो कि "पहले सही किया था या नहीं।" वो बीत गया।
यह पूछो कि "आगे करना सही है या नहीं।"
तीसरा कदम: फैसला लो
- अगर जवाब हां है → पूरे मन से करो। यह तुम्हारी choice है।
- अगर जवाब नहीं है → निकलने का रास्ता सोचो। पुराना तुम्हारा आगे तय नहीं करता।
- अगर जवाब पता नहीं है → रुको, सोचो, दूसरों से बात करो।
यह काम क्यों करता है:
यह सवाल पुराने का बोझ हटा देता है। सोचने देता है—आज क्या सही है, न कि कल क्या किया था।
जो गया वो गया।
जो आगे है—वो अभी भी तुम्हारे हाथ में है।
आखिरी बात
दो लाख छोड़ना आसान नहीं है।
वो मेहनत। वो उम्मीद। वो सपना।
पर असली सवाल यह है:
अगर आज शुरू करना होता, और सब पता होता—तो यही करता क्या?
अगर जवाब नहीं है—तो रुकना "बचाना" नहीं है। और डुबाना है।
यह मत पूछो "कितना लगाया।"
यह पूछो "यह अब मुझे क्या दे रहा है।"
अगर जवाब है "कुछ नहीं"—छोड़ो।
तुम यहां अपनी इज़्ज़त बचाने नहीं आए।
तुम यहां अपनी ज़िंदगी बनाने आए हो।
और नया नहीं बना सकते जब तक पुराना टूटा पकड़े बैठे हो।
याद रखो
समझने की बात:
जो पैसा या वक़्त लगाया—वो वापस नहीं आएगा। रुकने से नहीं, छोड़ने से नहीं। वो गया। अब सोचो आगे क्या करना है।
टूल:
"आज होता तो यही करता क्या?"—एक सवाल जो पुराने का बोझ हटाकर सोचने देता है।
कब इस्तेमाल करो:
जब भी "इतना तो लगा चुके" जैसी बात मन में आए। जब किसी चीज़ में फंसा लगे जो अब काम नहीं कर रही।
याद रखो:
रुकने से पुराना नहीं बचता। सिर्फ नया नुकसान होता है।