Reversible Decisions — हर दरवाज़ा पीछे से बंद नहीं होता
Paralysis की Problem
महीनों से सोच रहे हो।
शायद कोई job जिसके लिए apply करना है। कोई project शुरू करना है। कोई बात करनी है। कोई skill सीखनी है। कोई risk लेना है।
जब भी करने के करीब आते हो, कुछ रोक देता है।
"पर अगर काम न आया तो?" "अगर पछतावा हुआ तो?" "अगर गलती कर रहा हूँ तो?"
तो रुक जाते हो। और research करते हो। और लोगों से पूछते हो। रात 2 बजे सोचते हो।
हफ्ते महीने बन जाते हैं। महीने साल। और अभी भी "consider" कर रहे हो जो बस try कर सकते थे।
एक बात कोई नहीं बताता: ज़्यादातर decisions उतने permanent नहीं जितने लगते हैं। ज़्यादातर गलतियाँ ठीक हो सकती हैं। ज़्यादातर गलत मोड़ सुधर सकते हैं।
हर choice को पत्थर पर खुदा मान रहे हो—जबकि ज़्यादातर pencil से लिखी हैं।
हम ऐसे क्यों हैं?
Problem ये है: तुम्हारा दिमाग reversibility assess करने में बहुत खराब है। Uncertain outcomes को scary मानता है—भले ही worst case पूरी तरह survivable हो।
Uncertainty Blindness की Problem
Uncertain futures के बारे में सोचने में हम बुरे हैं। या तो uncertainty को completely ignore करते हैं (overconfident predictions) या उससे paralyzed हो जाते हैं (analysis paralysis)।
हमारा दिमाग local, visible environments model करने के लिए evolve हुआ—जहाँ threat दिख सके, danger estimate हो, act कर सको। Abstract, delayed, probabilistic outcomes handle करने के लिए evolve नहीं हुआ।
तो जब uncertain decision face करते हो, दिमाग दो में से एक करता है:
- Uncertainty ignore करके confidently outcome predict करता है (आमतौर पर गलत)
- Uncertainty को ही threat मानकर freeze हो जाता है
कोई भी response helpful नहीं। ज़रूरत है accurate assessment की: कितना uncertain है असल में? Actual worst case क्या है? Recover कर सकता हूँ?
पर हमारा software इसके लिए नहीं बना।
Regret Aversion की Problem
एक और जाल: action के regret से ज़्यादा inaction के regret से डरते हैं।
अगर कुछ try करो और fail हो, moment को point कर सकते हो। "नहीं करना चाहिए था।" Regret का चेहरा है।
अगर कभी try ही न करो, regret धुंधला है। "पता नहीं क्या होता।" इसके साथ जीना आसान है क्योंकि less concrete है।
तो दिमाग कहता है: Specific regret मत बनाओ। Safe रहो। Act मत करो।
पर research कुछ counterintuitive दिखाती है: समय के साथ, inaction का regret action से ज़्यादा रहता है। जो try नहीं किया वो ज़्यादा सालता है उससे जो try किया और fail हुए।
दिमाग short-term regret avoidance के लिए optimize कर रहा है long-term peace की कीमत पर।
दो तरह के Decisions
Jeff Bezos ने एक distinction articulate किया जो confusion काट देता है:
Type 1 decisions: Irreversible। One-way doors। एक बार अंदर गए, वापस नहीं आ सकते। शादी। बच्चा। Company बंद करना। इन्हें careful thought, consultation, deliberation चाहिए।
Type 2 decisions: Reversible। Two-way doors। दूसरी तरफ पसंद न आए तो वापस आ सकते हो। नई job जो छोड़ सकते हो। City जहाँ से वापस जा सकते हो। Project जो बंद कर सकते हो।
Problem: ज़्यादातर लोग Type 2 decisions को Type 1 जैसा treat करते हैं। Reversible choices को overthink करते हैं, certainty खोजते हैं जो मिल नहीं सकती, जबकि opportunity window धीरे-धीरे बंद होती जाती है।
पुराने लोग क्या जानते थे
अभिमन्यु का चक्रव्यूह
एक ऐसे इंसान की बात बताता हूँ जिसने truly irreversible decision face किया—ताकि फर्क समझ आए।
अभिमन्यु, अर्जुन का बेटा, जानता था चक्रव्यूह में कैसे घुसना है—योद्धाओं का वो deadly rotating maze। माँ के गर्भ में सीखा था, पिता को describe करते सुनकर।
पर बाहर कैसे निकलना है वो नहीं सीखा था।
जब कौरवों ने चक्रव्यूह बनाया और कोई पांडव commander तोड़ नहीं पाया, अभिमन्यु ने volunteer किया। उसे exactly पता था किसमें जा रहा है। कोई exit plan नहीं। Irreversible।
ये Type 1 था। जानते हुए गया कि शायद न लौटे। और वो choice जानबूझकर ली।
Tragedy ये नहीं कि वो मरा। Tragedy ये होती अगर Type 1 decision को Type 2 मानता—अगर मान लेता कि हमेशा retreat कर सकता है।
पर flip side ये है: तुम्हारे ज़्यादातर decisions चक्रव्यूह नहीं हैं। ज़्यादातर में exit routes हैं। ज़्यादातर undo हो सकते हैं।
हनुमान की छलांग
जब राम की सेना समुद्र पहुँची, लंका का पता लगाना था। किसी को पार करना था।
हनुमान ने volunteer किया। शरीर बड़ा किया, दौड़ लगाई, और समुद्र पार छलांग लगाई।
पर notice करो: पीछे किनारा नहीं जलाया। सब कुछ एक छलांग पर दाँव नहीं लगाया।
गए, information इकट्ठी की, और वापस छलांग लगाई।
Mission Type 2 था। Reversible। जाओ, सीखो, लौटो।
बाद में ही, intelligence होने पर, सेना ने irreversible crossing commit की।
हनुमान सिखाते हैं: commit करने से पहले test करो। Reversible experiment को all-or-nothing gamble मत बनाओ। पहली छलांग reconnaissance थी। Final battle commitment था।
Wisdom ये जानना है कौन सा कौन है।
आज की ज़िन्दगी में
कहाँ Type 2 decisions को Type 1 जैसा treat कर रहे हो?
Career में: Different role या industry try करना चाहते हो। Permanent लगता है। Final। पर leave of absence ले सकते हो? छह महीने try कर सकते हो? ज़रूरत पड़े तो network करके वापस जा सकते हो? ज़्यादातर career moves उतने reversible हैं जितना लगता नहीं।
Projects में: कुछ शुरू करना चाहते हो—side business, YouTube channel, creative project। Perfect plan का इंतज़ार कर रहे हो। पर ये Type 2 है। Quietly launch करो। काम न आए तो delete करो। Pivot, change, shut down। कोई force नहीं कर रहा हमेशा के लिए commit करने को।
Beliefs में: एक opinion पकड़े हो क्योंकि mind बदलना मानना है कि गलत थे। पर beliefs Type 2 हैं। Update कर सकते हो। Evolve कर सकते हो। गलत होना शर्मनाक नहीं जब सीखने को तैयार हो।
DDLJ की Train
याद है दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का climax?
सिमरन train में है। Train चल रही है। राज platform पर है, साथ-साथ भाग रहा है।
उसके पास seconds हैं decide करने को।
ये scene perfectly capture करता है Type 1 vs Type 2 real-time में।
Train जाने से पहले, उसकी choice reversible है। बैठी रह सकती है। हाथ बढ़ा सकती है। किसी भी तरह, mind बदल सकती है।
पर train accelerate हो रही है। Window narrow हो रहा है। Type 2 decision हर second Type 1 बनता जा रहा है।
एक बार train उसे लेकर चली जाए—या वो राज का हाथ पकड़े और train बिना उसके जाए—decision हो गया। Irreversible।
तुम्हारे ज़्यादातर decisions में वो urgency नहीं है। Test करने का time है। Try करने का। Step back लेने का।
पर कभी-कभी train जा रही होती है। और जब हो, तो फर्क जानना चाहिए।
हर decision को जाती हुई train मत मानो। पर जब train हो—overthinking में miss मत करो।
टूल: Type 1 vs Type 2 Filter
एक और महीना deliberate करने से पहले, ये filter run करो:
सवाल 1: Reversible है?
पसंद न आए तो undo कर सकता हूँ? Mind बदल सकता हूँ? Pivot कर सकता हूँ?
- अगर हाँ → Type 2। तेज़ चलो।
- अगर ना → Type 1। Carefully सोचो।
सवाल 2: गलत हुआ तो worst case क्या है?
Fail हुआ तो actually क्या खोऊँगा?
- Worst case survivable है → Type 2। Test करो।
- Worst case catastrophic है → Type 1। और information लो।
सवाल 3: पहले छोटा test कर सकता हूँ?
Full commitment के बिना इसका version try कर सकता हूँ?
- एक साल की जगह एक महीना?
- ₹5 लाख की जगह ₹5,000?
- Launch से पहले pilot?
अगर हाँ → Definitely Type 2 को Type 1 जैसा treat कर रहे हो।
ये काम क्यों करता है:
Cognitive traps bypass करता है:
- Uncertainty blindness: Actual reversibility का accurate assessment force करता है
- Regret aversion: "Action का regret हो सकता है" को "Inaction का regret definitely होगा" में reframe करता है
- Over-deliberation: Thinking time को actual stakes से match करता है
Rule: Decision-making effort को decision की actual reversibility से match करो। Months मत लगाओ किसी चीज़ पर जो एक week में सीख सकते हो।
गहरी बात
ये सब एक जगह जुड़ता है:
गलत होना okay है।
इसका मतलब stupid नहीं। मतलब fail नहीं। बस मतलब कुछ try किया और काम नहीं आया।
कभी गलत न होने का एकमात्र तरीका कुछ भी try न करना। और वो wisdom नहीं—वो छुपना है।
अभिमन्यु जानते हुए चक्रव्यूह में गया कि बाहर नहीं आ सकता। True irreversibility के सामने वो courage था।
हनुमान ने समुद्र पार छलांग लगाई और वापस छलांग लगाई। वो wisdom थी—commit करने से पहले test करना।
तुम्हारे ज़्यादातर decisions हनुमान की category में हैं, अभिमन्यु की नहीं। छलांग लगा सकते हो और लौट सकते हो। Test कर सकते हो और adjust कर सकते हो। Try कर सकते हो और सीख सकते हो।
जो uncertainty इतनी scary लगती है? वो आमतौर पर Type 2 uncertainty है। Life-or-death नहीं। Irreversible नहीं। बस uncomfortable।
और uncomfortable survivable है।
ये करके देखो
कुछ सोचो जिसे overthink कर रहे हो। कोई decision जिस पर बैठे हो।
Filter run करो:
-
अगर ये करूँ और काम न आए, undo कर सकता हूँ? Course बदल सकता हूँ?
-
Actual worst case क्या है? Survivable है?
-
पहले छोटा version test कर सकता हूँ?
अगर answers Type 2 suggest करते हैं—move करने पर विचार करो। आज।
इसलिए नहीं कि certain हो। क्योंकि certainty point नहीं है। Learning है।
सच
Uncertainty blindness unknown outcomes को जितने हैं उससे ज़्यादा scary बनाती है।
Regret aversion inaction के धुंधले regret को action के specific regret से prefer करवाती है—भले ही long-term में inaction ज़्यादा सालती है।
अभिमन्यु दिखाते हैं Type 1 असल में कैसा दिखता है: irreversible, high-stakes, careful thought deserve करता है।
हनुमान दिखाते हैं Type 2 कैसा दिखता है: reversible, testable, quick action deserve करता है।
DDLJ train दिखाती है कि कभी-कभी Type 2 Type 1 बन जाता है—और art ये है कि पहचानो किस moment में हो।
तुम्हारे ज़्यादातर decisions? Pencil हैं, pen नहीं। Erase कर सकते हो। Rewrite कर सकते हो। फिर try कर सकते हो।
हर चीज़ को life sentence जैसा treat करना बंद करो।
फटाफट सवाल
जब decision से paralyzed हो, ये पूछो:
Reversibility Check: → "काम न आया तो undo कर सकता हूँ? Course बदल सकता हूँ? फिर try कर सकता हूँ?"
अभिमन्यु Test: → "ये actually चक्रव्यूह है (कोई exit नहीं)—या बस वैसा treat कर रहा हूँ?"
हनुमान Approach: → "छलांग लगा सकता हूँ, सीख सकता हूँ, और वापस छलांग लगा सकता हूँ—पूरा commit करने से पहले?"
DDLJ Train: → "क्या ये decision irreversible बनता जा रहा है जब मैं overthink कर रहा हूँ? कोई train जा रही है?"
Pencil vs Pen: → "ये pencil में लिखा है (erasable) या pen में (permanent)? ज़्यादातर चीज़ें pencil हैं।"
संक्षेप में
| | | |---|---| | जाल | हर decision को permanent मानना—जब ज़्यादातर undo हो सकते हैं | | क्यों होता है | Uncertainty blindness (unknown outcomes को जितने हैं उससे scary मानते हैं), regret aversion (action के regret से ज़्यादा डरते हैं inaction से—पर inaction ज़्यादा सालती है) | | अभिमन्यु की सीख | चक्रव्यूह truly irreversible था। तुम्हारे ज़्यादातर decisions नहीं हैं | | हनुमान की सीख | छलांग लगाओ, information लो, वापस छलांग लगाओ। पूरा commit करने से पहले test करो | | टूल | Type 1 vs Type 2 Filter: Reversible है? → Worst case क्या है? → छोटा test कर सकता हूँ? | | सच | गलत होना okay है। ज़्यादातर गलतियाँ ठीक हो सकती हैं। ज़्यादातर गलत मोड़ सुधर सकते हैं |
आज खुद से पूछो:
क्या overthink कर रहा हूँ जो simply test कर सकता था?
और: अगर गलत हुआ, recover कर सकता हूँ? (Hint: आमतौर पर हाँ।)