अध्याय 11: Sunk Cost — कल के लिए आज को बंधक मत बनाओ
अध्याय 11

Sunk Cost — कल के लिए आज को बंधक मत बनाओ

वो फंसा हुआ अहसास

वो अहसास पहचानते हो ना?

किसी चीज़ में फंसे हो—नौकरी, रिश्ता, बिज़नेस, कोई कोर्स—और अंदर से पता है कि कुछ सही नहीं है। काफी समय से सही नहीं है।

पर जब भी छोड़ने का सोचते हो, एक आवाज़ रोक देती है।

"पर मैंने तीन साल लगाए हैं।" "इतना पैसा खर्च कर दिया।" "इतनी कुर्बानी दी है..." "अगर अब छोड़ा तो सब बर्बाद।"

वो आवाज़ समझदार लगती है। ज़िम्मेदार लगती है। लगता है बचा रही है।

पर वो बचा नहीं रही।

वो आवाज़ तुम्हें फंसाए हुए है। और जितना सुनोगे, उतनी ज़िन्दगी उस चीज़ के पीछे बीत जाएगी जो पहले ही जा चुकी है।

हम ऐसे क्यों हैं?

अजीब बात ये है: ये जाल दिमाग की गड़बड़ नहीं है। ये feature है। पहले काम करता था—अब नहीं करता।

नुकसान का डर (Loss Aversion)

1970 के दशक में दो वैज्ञानिकों—Daniel Kahneman और Amos Tversky—ने कुछ हैरान करने वाला खोजा। पता चला कि नुकसान का दर्द, बराबर के फायदे की खुशी से दोगुना ज़्यादा लगता है।

₹1,000 खोए? उसका दर्द लगभग ₹2,000 कमाने की खुशी के बराबर है।

ये कमज़ोरी नहीं है। पुराने ज़माने में ये समझदारी थी। जब संसाधन कम थे, नुकसान से बचना (खाना, घर, समूह का भरोसा न खोना) फायदा उठाने से ज़्यादा ज़रूरी था। जो बचाकर रखता था, वो जीता था।

पर दिक्कत यहाँ है: "नुकसान कम करना" भी दिमाग को नुकसान ही लगता है।

जब तीन साल लगाए हैं किसी चीज़ में जो काम नहीं कर रही, तो छोड़ना = वो तीन साल खोना। दिमाग चिल्लाता है: मत खोओ! पकड़े रहो! शायद सुधर जाए!

भले ही वो तीन साल तो जा चुके। भले ही रुकने से और खोओगे।

Commitment का जाल

एक और परत है। इसे "commitment escalation" कहते हैं—"इतना लगाया है, अब कैसे छोड़ें" वाला सोच।

जितना ज़्यादा लगाया, उतना छोड़ना मुश्किल—चाहे आगे बढ़ना समझ में न आए। इसीलिए:

  • निवेशक डूबते startup में और पैसा डालते हैं ("₹50 लाख लगा दिए, अब कैसे रुकें")
  • देश हारी हुई लड़ाइयाँ लड़ते रहते हैं ("इतने सैनिक शहीद हुए, उनका सम्मान करना है")
  • लोग टूटे रिश्तों में सालों रहते हैं ("इतना कुछ झेला है साथ में...")

निवेश ही निवेश को justify करने लगता है। घूमता तर्क है, पर समझदारी लगता है।

पहचान का मसला

और एक जाल है—शायद सबसे गहरा।

हम सिर्फ समय, पैसा, मेहनत नहीं लगाते। अपनी पहचान लगाते हैं।

"मैं वो हूँ जिसने ये commit किया।" "मैं quitter नहीं हूँ।" "ये मेरी चीज़ है।"

जब पहचान किसी चीज़ से जुड़ जाती है, छोड़ना सिर्फ practical decision नहीं रहता। लगता है खुद का कुछ खो रहे हो। लगता है मान रहे हो कि अपने बारे में गलत थे।

इसीलिए sunk cost का जाल इतना कठिन है। ये math का मामला नहीं। ये meaning का मामला है।

पुराने लोग क्या जानते थे

विभीषण का चुनाव

एक ऐसे आदमी की बात बताता हूँ जिसने तीनों जालों का सामना किया—नुकसान का डर, commitment, पहचान—और फिर भी आज़ाद हुआ।

विभीषण रावण का छोटा भाई था। सिर्फ भाई नहीं—उसका भरोसेमंद सलाहकार, मंत्री, अंदर के घेरे का हिस्सा। विभीषण की हर चीज़—पद, इज़्ज़त, पहचान—लंका से जुड़ी थी।

फिर रावण ने सीता का अपहरण किया।

विभीषण ने भाई को भारी गलती करते देखा। समझाया। चेताया। सीता वापस करने की भीख माँगी। पर घमंड में डूबा रावण नहीं माना।

अब विभीषण के सामने चुनाव था।

Sunk cost की आवाज़ फुसफुसाई: पूरी ज़िन्दगी यहीं लगाई है। छोड़ने का मतलब सब खोना—घर, परिवार, रुतबा। ये मानना कि इतने साल रावण का साथ देना गलत था।

और ये गलत नहीं था। छोड़ने से सच में ये सब खोया।

पर विभीषण ने sunk cost के बारे में एक बात समझी जो रावण कभी नहीं समझा: बीता हुआ गलती जारी रखने की इजाज़त नहीं देता। बस बताता है कि यहाँ कैसे पहुँचे।

उसने समुद्र पार किया। राम की सेना से जुड़ा। और रावण की हार के बाद लंका का राजा बना।

शिव सिद्धांत

हम शिव को सिर्फ सृष्टिकर्ता नहीं, महाकाल—महान विनाशक—के रूप में भी पूजते हैं।

क्योंकि विनाश हमेशा बुरा नहीं होता। कभी-कभी ज़रूरी होता है।

शिव इस सच को दर्शाते हैं: कुछ चीज़ों को खत्म होना होता है। इसलिए नहीं कि बेकार थीं। इसलिए नहीं कि शुरू से गलती थीं। बल्कि इसलिए कि उनका मकसद पूरा हो गया। वक़्त के बाद पकड़े रहना उन्हें बचाता नहीं—जो आगे आना है उसे रोकता है।

यही sunk cost की सोच का इलाज है।

डूबते बिज़नेस को पकड़े रखने वाला निवेशक अपने निवेश का सम्मान नहीं कर रहा। अगले बिज़नेस को जन्म लेने से रोक रहा है।

खत्म हो चुके रिश्ते में रहने वाला वफादार नहीं है। उस रिश्ते को रोक रहा है जिसकी असल में ज़रूरत है।

शिव का विनाश क्रूर नहीं है। वो जगह बनाता है। नई उगाई के लिए ज़मीन साफ करता है।

आज की ज़िन्दगी में

साफ करते हैं। ये जाल तुम्हें कहाँ पकड़ता है?

काम पर: एक नौकरी में हो जो छोटी हो गई। सात साल। प्रमोशन। पहचान बन गई है "जो हमेशा से यहाँ है।" छोड़ना लगता है उस कहानी को धोखा देना। पर कहानी तो खत्म हो चुकी—बस अगला अध्याय लिखने से मना कर रहे हो।

रिश्तों में: पाँच साल साथ। परिवारों से मिलवाया। भविष्य की योजनाएँ बनाईं जो अब गलत लगती हैं। इतिहास असली है—पर इतिहास उस भविष्य का कर्ज़ नहीं देता जो काम नहीं कर रहा।

बिज़नेस में: दो साल और पचास लाख किसी चीज़ में जो हर संकेत कहता है काम नहीं करेगी। पर वो पचास लाख तो जा चुके—दोनों तरफ। सवाल ये नहीं कि उन्हें "बचाएँ"—नहीं बचा सकते। सवाल ये है कि पचास लाख और खोना चाहते हो?

पढ़ाई में: तीन साल के कोर्स में दो साल जिससे नफरत है। एक साल और दुख झेलो उन दो साल के दुख का "सम्मान" करने के लिए? ये पूरा करना नहीं है। ये गलती को और बड़ा करना है।

स्वदेश वाला सवाल

याद है शाहरुख खान स्वदेश में?

मोहन के पास सब कुछ है—NASA की नौकरी, पैसा, इज़्ज़त। सालों की मेहनत से यहाँ पहुँचा। फिर वो अपने गाँव जाता है और एक अलग ज़िन्दगी देखता है।

उसकी sunk cost की आवाज़ ज़रूर चिल्ला रही होगी: पूरी ज़िन्दगी इस position के लिए काम किया। सब कहेंगे पागल हो—NASA की नौकरी एक गाँव के लिए?

पर मोहन ने एक अलग सवाल पूछा:

"अगर मैं आज से शुरू करूँ, जो अब जानता हूँ वो जानते हुए, क्या ये ज़िन्दगी चुनूँगा?"

जवाब था नहीं। और वो चला गया।

इसलिए नहीं कि NASA बुरा था। इसलिए नहीं कि वो साल बर्बाद हुए। बल्कि इसलिए कि बीता हुआ भविष्य का फैसला नहीं कर सकता।

Decision Tool

टूल: क्या मैं आज फिर चुनूँगा?

ये वो सवाल है जो सारे शोर को काट देता है:

"अगर इसके साथ कोई इतिहास न होता—कोई समय नहीं लगाया, पैसा नहीं खर्चा, भावनात्मक लगाव नहीं—तो क्या आज इसमें आता?"

ये नहीं: "क्या शुरू करना सही था?" वो बीते हुए की बात है।

बस ये: "क्या जारी रखना सही है?" वो भविष्य की बात है।

ये सवाल तीनों जालों को bypass करता है:

  • नुकसान का डर: बीते को गया मानकर "loss" का frame हटा देता है
  • Commitment का जाल: "इतना लगाया है" की loop तोड़ता है
  • पहचान की सुरक्षा: तुम कौन हो उसे तुमने क्या किया से अलग करता है

अगर जवाब हाँ है—रुको। जानबूझकर चुना है।

अगर जवाब ना है—बीते का वोट नहीं।

गहरी बात

ये सब एक जगह जुड़ता है:

बीता हुआ सबके लिए, हमेशा, sunk cost है।

सिर्फ dramatic पलों में नहीं जैसे विभीषण का लंका छोड़ना। हर फैसले में, हर दिन। बीता हमेशा जा चुका होता है। कल जो किया वो वापस नहीं हो सकता। पिछले साल जो खर्चा वो वापस नहीं आ सकता।

एक ही सवाल हमेशा मायने रखता है: जहाँ अभी हूँ, वहाँ से आगे क्या करना चाहिए?

ये ठंडा नहीं है। बेरहम नहीं है। असल में उल्टा है।

जब बीते की बंधक नहीं रहते, तब उसे सही से सम्मान दे पाते हो। कह सकते हो: "उन तीन सालों ने मुझे सिखाया। जो हूँ वो बनाया। यहाँ लाए। और अब कुछ अलग चुन रहा हूँ—उनके बावजूद नहीं, उनकी वजह से।"

निवेश छोड़ने से बर्बाद नहीं होता। निवेश तब बर्बाद होता है जब वो तुम्हें फंसा ले।

ये करके देखो

कुछ सोचो जो पकड़े हुए हो। नौकरी, project, रिश्ता, कोई विश्वास।

खुद से ईमानदारी से पूछो:

  1. अगर इसके साथ कोई इतिहास न होता—अगर आज fresh चुन रहे होते—क्या चुनते?

  2. इसलिए रुके हो क्योंकि भविष्य के लिए सही है? या इसलिए कि छोड़ना बीते को खोना लगता है?

  3. बीते का सम्मान आगे बढ़कर करने का क्या मतलब होगा, बजाय फंसे रहकर सम्मान करने के?

सच

Kahneman और Tversky ने खोजा कि इस जाल में क्यों फंसते हैं। नुकसान का डर। Commitment का जाल। पहचान की सुरक्षा।

विभीषण ने दिखाया कैसे निकलें: पूछो अभी क्या सही है, नहीं कि तब क्या लगाया था।

शिव इसका समाधान हैं: विनाश त्रासदी नहीं है। कभी-कभी सृजन का एकमात्र रास्ता है।

तुम्हारा बीता जेल नहीं है—जब तक तुम इसे बनाओ नहीं।

जो लगाया उसने तुम्हें यहाँ पहुँचाया। अब फिर चुन सकते हो।

फटाफट सवाल

जब फंसा महसूस हो, ये पूछो:

मूल सवाल: → "अगर आज fresh शुरू करूँ—कोई इतिहास नहीं, कोई निवेश नहीं—क्या ये चुनूँगा?"

विभीषण परीक्षा: → "इसलिए रुका हूँ क्योंकि सही है? या इसलिए कि छोड़ना धोखा लगता है?"

शिव जाँच: → "क्या खत्म होना चाहिए ताकि कुछ नया शुरू हो?"

स्वदेश सवाल: → "जो अब जानता हूँ वो जानते हुए, क्या आज इसमें आता?"

नुकसान का उलटा: → "असली नुकसान टाल रहा हूँ? या सिर्फ खोने का अहसास टाल रहा हूँ?"

संक्षेप में

| | | |---|---| | जाल | हम लगाते रहते हैं—इसलिए नहीं कि काम कर रहा, बल्कि इतना पहले लगा चुके | | क्यों होता है | नुकसान का डर (नुकसान 2x ज़्यादा दुखता है), commitment का जाल, पहचान की सुरक्षा | | विभीषण की सीख | दशकों बाद लंका छोड़ा। बीता गलती जारी रखने की इजाज़त नहीं देता | | शिव की सीख | कुछ चीज़ें खत्म होनी चाहिए। विनाश सृजन के लिए जगह बनाता है | | टूल | "क्या आज फिर चुनूँगा?" — बीते की वर्तमान पर शक्ति हटाता है | | सच | निवेश छोड़ने से बर्बाद नहीं होता। जब वो फंसा ले तब बर्बाद होता है |


आज खुद से पूछो:

क्या पकड़े हूँ क्योंकि लगाया था—इसलिए नहीं कि सही है?

और: अगर छोड़ दूँ तो क्या होगा?